अशुभ शनि के लक्षण व अशुभ शनि के उपाय / अशुभ ही नहीं, शुभ भी है शनि ग्रह

अशुभ शनि के लक्षण (Ashubh shani ke lakshan): शनि देव भगवान शिव के भक्त हैं और शिव की पूजा से प्रसन्न होते हैं। शिव के साक्षात रूप रुद्राक्ष के प्रयोग से भी साढ़ेसाती का असर कम होता है। आईये जाने शनि ग्रह का फल, अशुभ शनि के लक्षण और अशुभ शनि के उपाय के बारे में –

अशुभ शनि के लक्षण (Ashubh shani ke lakshan)

अशुभ शनि के लक्षण
Ashubh shani ke lakshan

शनिदेव के प्रकोप से हर कोई डरता है, क्योंकि शनि के प्रभाव के संबंध में अनेक भ्रांतिया लोगों के मन में है। लेकिन क्या सचमुच शनि अशुभ ग्रह है, जो मनुष्य केवल संकट और पीड़ा ही देता है। नहीं ! ऐसा नहीं है। 

भारतीय ज्योतिष में शनि को न्यायाधीश और मोक्षकारक ग्रह माना गया है। वह मनुष्य को आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख करता है। विपत्तियों और संकटों की अग्नि में तपाकर मनुष्य को कंचन जैसा खाना बनाता है। 

शनि की दो राशियां है – मकर और कुंभ। शनि के कारक भाव है – षष्ठ, अष्टम, दशाम, और द्वादश। शनि की उच्च राशि है तुला और नीच राशि है मेष। यह एक ऐसा ग्रह है, जिसका फल पहले से ही मालूम पड़ जाता है। 

इसलिए यदि प्रयास करके इसको शांत ही किया जाए तो बहुत हद तक इसके अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसमें भी संदेह नहीं कि इसका अशुभ राजा को रंग बना देता है, परंतु शिष्टाचार एवं धर्मपरायण लोग इस ग्रह की पूजा-अर्चना करके अपने कठिन समय को धैर्यपूर्वक बिता लेते हैं। 

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शनि ग्रह का फल / विभिन्न राशियों पर शनि का प्रभाव 

शनि मेष लग्न के लिए बाधाकारक ग्रह है। वृष राशि के लिए, नवम-दशम का स्वामी होते हुए भी बाधाकारक है और मध्यम फल प्रदान करता है। मिथुन और कन्या के लिए मध्यम फलदायी है। 

कर्क एवं सिंह राशि के लिए यह अच्छा नहीं है। सिंह में अन्य ग्रहों के अनुसार शुभ परिणाम भी देता है। तुला के लिए पूर्ण योगकारक है एवं अपनी दशा-अंतर्दशा में पूर्ण सुख-शांति एवं समृद्धिकारक है।

वृश्चिक एवं धनु के लिए शनि साधारण फलदायी है।  मकर एवं कुंभ राशि पर इसका प्रभाव मिश्रित होता है। मीन राशि पर शनि का अशुभ प्रभाव नहीं होता। 

साढ़ेसाती और ढैय्या का फल 

शनि की साढ़ेसाती भी बहुत प्रभावशाली होती है। यह दशा से भी अधिक जातक को या तो तंग कर देती है या ऊपर चढ़ा देती है। जब भी शनि चंद्रमा से बारहवें, चंद्रमा के ऊपर या चंद्रमा से दूसरे भाव में गोचर करता है, तो शनि की साढ़ेसाती कहलाती है। 

इस प्रकार जब शनि चंद्रमा से चौथे या आठवें भाव में गोचर करता है तो शनि की ढैय्या कहलाती है। आमतौर पर शनि की चौथे भाव की ढैय्या का असर बहुत ज्यादा नहीं होता। जबकि शनि का साढ़ेसाती सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है। 

यदि चंद्रमा से साढ़ेसाती या अष्टम ढैय्या चल रही हो और लग्न से आठवें या बारहवें भाव में शनि हो, तो शनि का प्रकोप कई गुना बढ़ जाता है। साथ ही बाधाकारक ग्रह व्यक्ति की कुंडली में उसी स्थान पर बैठा हो, तो शनि ग्रह का प्रकोप अपनी सीमा पर पहुंच जाता है। 

इसी प्रकार यदि शनि की साढ़ेसाती हो तो, लेकिन योगकारी भी हो और दशा भी योगकारक ग्रह की हो एवं लग्न से केतु या त्रिकोण में विचरण कर रहा हो तो, शनि ग्रह अतिशु होता है। 

अशुभ शनि के लक्षण / शनि का असर

शनि के प्रकोप से मनुष्य को मानहानि सहनी पड़ती है। व्यापार या कारोबार मंदा हो जाता है। कोशिशों के बावजूद आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होता। सरकारी दखल के कारण रातों की नींद उड़ जाती है। कर्ज का भय  बहुत सताता है। 

स्वास्थ्य की दृष्टि से पेट में दर्द, शरीर में बेचैनी, टांगों एवं पैरों में कष्ट रहने लगता है। मित्र भी दुश्मनों जैसा व्यवहार करने लगते हैं। घर-परिवार के सदस्य भी विमुख होने लगते हैं। 

जीवन बोझल-सा प्रतीत होने लगता है। इस कठिन परिस्थितियों से बचने के लिए व्यक्ति को धर्म का रास्ता अपनाना चाहिए। 

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अशुभ शनि के उपाय

यह सच है कि आपके श्रद्धा एवं आस्था के बल पर किसी ग्रह को अनुकूल किया जा सकता है। शनि ग्रह की पीड़ा से मुक्ति के लिए उपाय हैं –

  • शनिवार को राजा दशरथ कृत शनि स्त्रोत, हनुमान कवच या सुंदरकांड का पाठ करें। 
  • हनुमान जी की प्रतिमा को सिंदूर, जनेऊ, माला, वस्त्र एवं प्रसाद का भोग लगाकर प्रार्थना करें। 
  • गरीब एवं जरूरतमंद व्यक्तियों को सरसों का तेल, उड़द, काले वस्त्र, चप्पल, जूता, लोहे की बनी वस्तुओं आदि का दान करना चाहिए। 
  • शनि मंदिर है पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर शनि अष्टक मंत्र का जाप करें 
  • गरीब, रोगियों, वृद्धों एवं विधवाओं की आर्थिक एवं मानसिक सहायता करने से शनि पीड़ा कम होती है। 
  • शिवजी का पूजन, व्रत एवं शिव तांडव स्त्रोत का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। 

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